Thursday, May 2, 2019

क्या हिमालय में छुप कर रहते हैं येति?

मेसनर का मानना है कि येति को बंदर और इंसान के बीच का कोई जीव समझना नादानी है.
मेसनर कहते हैं कि, 'लोग पागलपन से भरी कहानियां पसंद करते हैं. वो हक़ीक़त का सामना नहीं करना चाहते. उन्हें लगता है कि निएंडरथल मानव की तरह ही येति भी मानव का कोई क़ुदरती रिश्तेदार है.'
2014 में मेसनर के दावे को कुछ वैज्ञानिकों ने रिसर्च की बुनियाद पर सही पाया. ऑक्सफोड्र यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर ब्रायन साइक्स ने येति के अंगों के कुछ नमूनों की पड़ताल करने की ठानी. ब्रायन और उनकी टीम ने बालों, हड्डियों के डीएनए की पड़ताल कर के उसकी तुलना दूसरे जीवों से की.
ब्रायन साइक्स और उनकी टीम ने पाया कि लद्दाख और भूटान से मिले दो सैंपल आज से 40 हज़ार साल पहले पाये जाने वाले ध्रुवीय भालू से मिलते हैं.
इससे एक नयी थ्योरी का जन्म हुआ. माना गया कि हिमालय में भालुओं की ऐसी नस्ल रहती है, जो ध्रुवीय भालू से मिलती है, जिसके बारे में इंसानों को अब तक पता नहीं.
डेनमार्क की कोपेनहेगेन यूनिवर्सिटी के रॉस बार्नेट ने कहा कि, 'हिमालय में ध्रुवीय भालुओं के होने की बात सोचना पागलपन है.'
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के ही सीरीड्वेन एडवर्ड्स के साथ मिलकर बार्नेट ने ब्रायन साइक्स की टीम के इकट्ठा किए गए सबूतों की फिर से पड़ताल की. बार्नेट ने पाया कि जो डीएनए ब्रायन की टीम ने जुटाया था, वो 40 हज़ार साल पहले पाये जाने वाले ध्रुवीय भालू से बिल्कुल नहीं मिलता.
तो, अब बार्नेट और उनकी टीम इस नतीजे पर पहुंची कि जिस डीएनए सैंपल की पड़ताल ब्रायन साइक्स की टीम ने की थी, वो असल में टूटा-फूटा था. बाल से डीएनए के नमूने मिल जाते हैं. पर, ये बिगड़ भी सकता है.
बार्नेट के रिसर्च पर अमरीका के स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूट के एलिसर गुटिएरेज़ और कैंसस यूनिवर्सिटी के रोनाल्ड पाइन की रिसर्च से भी मुहर लगी है. इन दोनों वैज्ञानिकों ने डीएनए के नमूनों की जांच के बाद कहा कि ये असल में पहाड़ों में पाये जाने वाले भूरे भालू के डीएनए हैं.
ब्रायन साइक्स और उनकी टीम ने अपनी ग़लती मानते हुए एक बयान जारी किया था. लेकिन, उन्होंने दोहराया कि हिमालय में कोई येति या हिममानव नहीं रहता.
लोगों को लगता है ये कि इंसान की कोई नस्ल है, जो छुप कर हिमालय की गुफ़ाओं में रहती है.
इंसानों की कुछ नस्लों के हाल में मिले सबूत इस यक़ीन पर मुहर लगाते हैं.
रूस के साइबेरिया में 2008 में डेनिसोवान्स नाम की मानव प्रजाति के सबूत मिले थे. माना जाता है कि इंसानों की ये नस्ल हज़ारों साल तक इस इलाक़े में आबाद थी. हालांकि वो 40 हज़ार साल पहले ख़त्म हो गए.
इसी तरह छोटे क़द के मानव होमो फ्लोरेंसिएनसिस इंडोनेशिया में आज से महज़ 12 हज़ार साल पहले तक रहा करते थे.
इसका मतलब ये निकलता है कि दुनिया के किसी कोने में इंसानों की एक नस्ल होने की संभावना को पूरी तरह से ख़ारिज नहीं किया जा सकता.
2004 में विज्ञान पत्रिका नेचर में हेनरी गी ने लिखा था कि, 'इंडोनेशिया में होमो फ्लोरिएंसिस के इतने लंबे वक़्त तक आबाद रहने का एक ही मतलब निकलता है. वो ये कि दुनिया के कुछ हिस्सों में येति जैसे मानव और बंदर के बीच की कड़ी वाले जीव हो सकते हैं.'
पर, दिक़्क़त ये है कि अब तक इसके कोई सबूत नहीं मिले. अगर हमारी नस्ल के कुछ जीव कहीं रहते हैं, तो वो किसी को तो दिखते.
येति या इंसान जैसे बड़े जीव का लंबे वक़्त तक छुप कर रहना मुमकिन नहीं. बोनबोस या ओरांगउटान की कम आबादी भी दिखाई तो देती ही है.
अमरीका के नॉक्सविल स्थित टेनेसी यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले व्लादिमिर डाइनेट्स कहते हैं कि, 'हिमालय में कई इलाक़े ऐसे हैं, जहां येति जैसे जीव छुप कर रह सकते हैं. लेकिन, ऐसे ठिकानों के इर्द-गिर्द इंसान रहते हैं, उनकी नज़र से ये जीव ओझल नहीं रह सकते.'
ऐसे जीवों को खाने-पीने के लिए तो बाहर निकलना ही होगा. वो छुप नहीं सकते. हिमालय में इंसान जैसे जीव के रहने की राह में क़ुदरत भी बड़ी चुनौती है. इतनी ठंड में इंसानों का लंबे वक़्त तक बसर करना मुमकिन नहीं.
जापान के मकाक बंदर सबसे ज़्यादा ठंड झेल पाने वाले प्राइमेट्स माने जाते हैं. फिर, बर्फ़ीले पहा़ड़ों में छुपकर रहने वालों को भी खाने की तलाश में तो मैदानों में उतरना ही होगा.

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